गुप्त वंश के इतिहास के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी

नमस्कार दोस्तो....


गुप्त साम्राज्य के इतिहास के बारे मे कुछ महत्वपूर्ण जानकारी 


गुप्त वंश :

गुप्‍त साम्राज्य जिसे भारत के इतिहास में स्वर्णिम युग कहा जाता है. इस साम्राज्य की स्थापना महाराज गुप्त ने की थी. उनका वास्तविक नाम 'श्री गुप्त' था. इसकी स्थापना 275 ई. मे हुई थी. इस साम्राज्य का उदय प्रयाग के निकट कौशाम्बी मे हुआ था. गुप्त साम्राज्य के लेखों में 'श्री गुप्त' को गुप्त साम्राज्य का प्रथम शासक बताया गया है. हालाकि प्रभावती गुप्त के पुना ताम्रपत्र अभिलेख में उसे 'आदिराज' के नाम से संबोधित किया गया है.

अगर हम गुप्त साम्राज्य की स्थापना के पहले बात करे तो लगभग 322 ईसा पूर्व से लेकर 100 ईसा पूर्व तक मोर्य वंश का शासन रहा. इसके बाद पुष्पमित्र शुंग ने मोर्य वंश के 12 वें सम्राट वृहदथ मोर्य की हत्या करके शुंग वंश की स्थापना की थी. इसके बाद कर्ण वंश और सातवाहन वंश भी आए लेकिन इन सभी वंशो मे ऐसा कोई शासक नहीं था जो ठीक तरीके के साम्राज्य को संभाल सके. इसलिए धीरे धीरे इस सभी वंशो का पतन होने लगा. और इन सबके बाद 275 ई. में गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ.



श्री गुप्त : 

गुप्त वंश के सर्व प्रथम राजा थे और गुप्त वंश की स्थापना की थी. 




घटोत्कच :

घटोत्कच जो कि श्री गुप्त का उतराधिकारी था. श्री गुप्त के बाद उसने गुप्त वंश की कमान संभाली. लेकिन इतिहास में हमे घटोत्कच के बारे में ज्यादा देखने को या सुनने को नहीं मिला है क्योकि शायद गुप्त वंश को आगे बढ़ाने में उसका उतना योगदान नहीं होगा.



चंद्रगुप्त प्रथम : 

घटोत्कच के बाद उसके अनुगामी राजा के तौर पर उसका बेटा चंद्रगुप्त-प्रथम शासक बना. चंदगुप्त प्रथम  319 ई. मे गुप्‍त वंश का राजा बना. उसने अपने आप को स्वतंत्र राजा घोषित किया और महाराजाधीराज की उपाधि धारण की.


चंद्रगुप्त के लग्न लिच्छवि जाती की राजकन्या कुमारदेवी के साथ हुए. कुमारदेवी के पिता की सहाय से चंद्रगुप्त ने अपने राज्य का विस्तार किया. उसने अपनी प्रतिष्ठा, सत्ता और लश्करी ताकत मे भी विस्तार किया. इसके बाद ही असल मे वास्तविक रूप से गुप्त संवत की शुरुआत हुई. इसलिए चंद्रगुप्त को गुप्त साम्राज्य का प्रथम स्वतंत्र और सफल राजा कहा जाता है.



समुद्रगुप्त : 

चंद्रगुप्त प्रथम के बाद उसके बेटे समुद्रगुप्त ने गद्दी संभाली. इसने करीब 335 ई. के आसपास गद्दी संभाली थी. समुद्रगुप्त एक बहोत ही शक्तिशाली राजा था. उसने कई राज्यों पर हमला करके वहा पर विजय प्राप्त की थी. समुद्र गुप्त के इस शासनकाल की विस्तृत जानकारी इलाहाबाद के स्तंभ शिलालेख में देखने को मिलती है. यह शिलालेख की जानकारी समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेन के द्वारा बताई गई है.


समुद्रगुप्त गुप्त वंश का प्रथम शासक था जिसने अश्वमेध यज्ञ करवाया था.

समुद्रगुप्त ने युद्ध मे बिना हार के लगातार कई लड़ाईया जीती थी. इसलिए उसे 'भारत का नेपोलियन' कहा जाता है.



चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) : 

समुद्रगुप्त की मृत्यु के बाद उसके बेटे चंद्रगुप्त द्वितीय ने गद्दी संभाली. उसका वास्तविक नाम देवगुप्त था. चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपनी सेना के साथ शक राज्य पर आक्रमण करके शक क्षत्रप वंश का अंत किया था. इसलिए उसे 'शक-विजेता' या 'शकारी' भी कहा जाता है. चंद्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमादित्य की उपाधि भी धारण कि थी.


चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल के दौरान ही प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान ने भारत का दौरा किया था.

उसने पाटलिपुत्र के अलावा उज्जैन को अपनी दूसरी राजधानी बनाई थी.

चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में ही प्रसिद्ध नौ-रत्न हुआ करते थे. जिसमे प्रसिद्ध कवि कालिदास, चिकित्सक धन्वंतरि, वैज्ञानिक वराहमिहिर, वेताल भट्ट, अमरसिंह, शंकु, क्षपणक, घटकर्पर, और वररुचि शामिल थे. 



कुमारगुप्त प्रथम : 

चंद्रगुप्त द्वितीय के के बाद उसके बेटे कुमारगुप्त ने राज्यभार संभाला. कुमारगुप्त के शासनकाल के दौरान ही नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी. कुमार गुप्त ने अपने साम्राज्य की पूरी तरह रक्षा की जो कि उत्तर मे हिमालय से दक्षिण मे नर्मदा तक तथा पूर्व मे बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्चिम में अरब सागर तक विस्तृत था. कुमारगुप्त प्रथम के द्वारा अश्वमेघ यज्ञ किए जाने की पुष्टि भी मिलती है.




स्कन्दगुप्त : 

कुमारगुप्त की मृत्यु के बाद स्कन्दगुप्त ने गद्दी संभाली.


स्कन्दगुप्त एक लोकोपकारी राजा था और वह हमेशा अपनी प्रजा के सुख:दुख के बारे मे चिंता करता था. उसने क्रमादित्य, विक्रमादित्य जेसी उपाधियाँ भी धारण कि थी. करीब 467 ई. में स्कन्दगुप्त का निधन हो गया. 


स्कन्दगुप्त की मृत्यु के बाद धीरे धीरे गुप्त वंश का पतन होने लगा. हालाकि उसकी मृत्यु के बाद करीब 100 सालों तक गुप्त साम्राज्य बना रहा लेकिन वह धीरे धीरे नष्ट होने लगा. 



धन्यवाद.... 



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