हड़प्पा सभ्यता | सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी

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विषय : सिंधु घाटी सभ्‍यता / हड़प्पा सभ्यता

आज इस पोस्ट में मे आपको सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी के बारे मे बताऊँगा. बहोत सारी परीक्षाओ मे इसके के बारे में पूछा जाता है. इसलिये आप सभी को सिंधु घाटी सभ्यता के बारे मे जानकारी हो ये आवश्यक है. 




सिंधु घाटी सभ्यता / हड़प्पा सभ्यता के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी

हड़प्पा :

सिंधु घाटी सभ्यता की खोज के रूप में सर्व प्रथम हड़प्पा नामक स्थल की खोज हुई थी. इसलिए इसे हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है. हड़प्पा सभ्यता जो कि इतिहास मे बहोत जानी-मानी सभ्यता है. उसकी खोज 1921 मे हुई थी. दरअसल 1921 के दौरान जॉन मार्शल के निर्देशन मे रायबहादुर दयाराम साहनी ने इस स्थल का उत्खनन करवाया और हड़प्पा की खोज की. इसलिए दयाराम साहनी को हड़प्पा के खोजकर्ता माना जाता है. हड़प्पा, जिसकी खोज सबसे पहले हुई थी वह रावी नदी के बाएं किनारे पर है और यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत मे स्थित है.




मोहनजोदडो़ :

हड़प्पा की खोज के बाद 1922 में राखलदास बेनर्जी ने मोहनजोदडो़ की खोज की थी. यह स्थल जो कि सिंधु नदी के किनारे पर है और पाकिस्तान के सिंध प्रांत मे स्थित है. 
मोहनजोदडो़ का सिंधी भाषा में अर्थ 'मुर्दो का टीला' होता है. 



इस खोज के बाद बहोत सारी जगहो पर खुदाई का काम शुरू हुआ और इसी सभ्‍यता से मिलती जुलते बहोत सारे स्थल के बारे मे पता चला. यह सभी स्थल सिंधु नदी के आसपास में ही थे इसलिए इसको सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से जाना गया. आज तक करीब 1400 से भी ज्यादा स्थलों की खोज हो चुकी है. 





सिंधु घाटी सभ्यता के स्थल इन देशों में मोजूद है :

1. भारत 
2. पाकिस्तान 
3. अफ़ग़ानिस्तान




सिंधु घाटी सभ्यता के मुख्य स्थल :

1. हड़प्पा (पाकिस्तान) 
2. मोहनजोदडो़ (पाकिस्तान) 
3. लोथल (गुजरात - भारत)
4. कालीबंगा (राजस्थान - भारत) 
5. रोपड़ (पंजाब) 
6. अलमगीरपूर (मेरठ) 
7. चन्हुदडो़ (पाकिस्तान) 
8. सुत्कांगेडोर (पाकिस्तान) 
9. सुरकोटदा (गुजरात - भारत)
10. कोटदीजी (पाकिस्तान) 
11. रंगपुर (गुजरात - भारत) 
12. बालाकोट (पाकिस्तान)
13. धोलावीरा (गुजरात - भारत) 
14. बनवाली (हरियाणा - भारत) 




सिंधु घाटी सभ्यता की मुख्य विशेषताए :


सिंधु घाटी सभ्‍यता की नगर योजना : 

यह सभ्यता जो कि आज से कई सालो पहले अस्तित्व मे थी . हम सोंच भी नहीं सकते कि उस वक्त भी वहा कि नगर रचना इतनी सुव्यवस्थित और योजनाबद्ध होंगी. 
दरअशल इस सभ्यता मे नगर के विस्तार को दो भागों मे बांटा गया था. एक भाग जिसे पश्चिमि टीला कहते थे. जिसे दुर्ग भी कहा जाता था. वहां पर उस समय के अमीर लोग और शाही परिवार रहा करते थे. बाकी दूसरा भाग जो कि पूर्व की तरफ था जिसे पूर्वी टीला कहते थे. यह भाग को मुख्य शहर कहा जाता था जहां पर ज्यादातर सामान्य लोग रहा करते थे. यह पूर्वी टीला, पश्चिमी टीले से थोड़ी निचाई पर था. पश्चिमी टीले यानी दुर्ग के चारो तरफ दीवारे बनाई गई थी. माना जाता है कि इस दीवार को बनाने के लिए बाहर की तरफ पक्की ईंटे और अंदर की तरफ कच्ची ईंटो का उपयोग किया गया था. 




नगर के रास्ते :

इस सभ्यता में नगरो का निर्माण इस तरह किया गया था कि नगर के सभी रास्ते, गलियाँ एक दूसरे से समकोण पर मिलते थे. सभी रास्ते पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण की तरफ बनाए गए थे. रास्तो की यह योजना नगर को बहोत सारे भागो/खंडो मे विभाजित कर देती थी और इस सभी खंडो मे लोगो के घर बनाए जाते थे.




विशाल स्नानागार :

मोहनजोदडो़ से प्राप्त हुआ यह विशाल स्नानागार उस समय की एक खूबसूरत और अद्भुत रचना कहा जा सकता है. यह विशाल स्नानागार इतना बड़ा था कि अगर हम इसके माप/आकार की बात करे तो इसकी लंबाई करीब 12 मीटर थी, इसकी चोडाई करीब 7 मीटर थी, और इसकी गहराई करीब 2.43 मीटर जितनी थी. इस गहराई वाले स्नानागार मे नीचे उतरने के लिए स्नानागार की दोनों तरफ सीढ़ीया लगाई गई थी. इस स्नानागार का फर्श पक्की ईंटो से बनाया गया था. इस स्नानागार में कपड़े बदलने के लिए भी कक्ष बनाए गए थे. स्नानागार मे स्वच्छ पानी के आने की और गंदे पानी के निकाल की भी उत्तम व्यवस्था की गई थी. कई इतिहासकारों के अनुसार इस स्नानागार का इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानो के वक्त स्नान के लिए होता होंगा. 




जल निकास योजना / भूगर्भ गटर योजना :

इस सिंधु घाटी सभ्यता के नगरो मे जल निकास प्रणाली की भी उत्तम योजना पाई गई है. यहा के शहरो मे गंदे पानी के निकाल के लिए गटरों का निर्माण किया गया था. यहा कि छोटी छोटी गटरें बाद मे बड़ी गटर से मिलती थी और गंदा पानी छोटी गटरों के जरिए बड़ी गटर में चला जाता था.


धन्यवाद.... 

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